गरीब की झोपड़ी से सत्ता के महलों तक—कहाँ खो गई सच्ची पत्रकारिता इंद्र यादव
मुंबई आज देश के हर ड्राइंग रूम में जब टीवी ऑन होता है, तो ऐसा लगता है कि सच को किसी ने बंधक बना लिया है। चीखती-चिल्लाती डिबेट्स, स्टूडियो में बैठे अखाड़े के पहलवान नुमा ‘पत्रकार’, और हर शाम किसी एक एजेंडे को सेट करने की होड़—यही आज के दौर की मुख्यधारा की पत्रकारिता का कड़वा सच बन चुकी है। इसी बिकाऊ और प्रायोजित पत्रकारिता को आज जनता प्यार से ‘गोदी मीडिया’ कहती है।
आइए, इस खतरनाक षड्यंत्र की परतें उधेड़ते हैं और समझते हैं कि कैसे लोकतंत्र के इस सबसे बड़े पहरेदार ने खुद ही सेंध लगा दी है।
गोदी मीडिया का खतरनाक षड्यंत्र: सच का गला घोटने का खेल
मीडिया का काम आईना दिखाना होता है, लेकिन आज का तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया ऐसा आईना बन गया है जिसमें सिर्फ वही दिखता है जो हुक्मरान दिखाना चाहते हैं।
मुद्दों से भटकाने का सुनियोजित खेल: जब देश में बेरोजगारी चरम पर हो, महंगाई आसमान छू रही हो, युवा अग्निवीर योजना या पेपर लीक से परेशान हों, और किसानों की फसल के दाम न मिल रहे हों—तब भी टीवी स्क्रीन पर इन पर बात नहीं होगी। इसके बजाय, स्टूडियो में ऐसी बहसेंोसी जाती हैं जो समाज को बांटने, नफरत फैलाने और हिंदू-मुसलमान करने का काम करती हैं। यह जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का एक सोची-समझा षड्यंत्र है।
सत्ता से सवाल पूछने की बजाय चापलूसी: पत्रकारिता का मूल मंत्र है— “सत्ता से सवाल पूछना।” लेकिन आज गोदी मीडिया का एकमात्र धर्म सत्ता की जय-जयकार करना और हर गलत नीति को सही साबित करना बन गया है। सरकार की नाकामी को छिपाने के लिए हर रोज नए बहाने गढ़े जाते हैं।
विपक्ष और असहमति का अपराधीकरण: जो कोई भी सरकार से सवाल पूछता है, उसे तुरंत ‘देशद्रोही’ या ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का ठप्पा लगा दिया जाता है। मीडिया ने विपक्ष की हर आवाज को दबाने और जनता के बीच भ्रम फैलाने के लिए अपनी निष्पक्षता को गिरवी रख दिया है।
टीआरपी का गंदा खेल: सच को पीछे धकेलकर सनसनीखेज झूठ और सनसनी को परोसा जाता है, ताकि टीआरपी और विज्ञापनों का मोटा मुनाफा मिलता रहे। TRP के इस भूत ने पत्रकारिता की आत्मा को ही बेच खाया है।
#मीडिया का असली दायित्त्व: पहरेदार को उसका फर्ज याद दिलाना
पत्रकारिता कोई धंधा या किसी राजनीतिक दल का पम्पलेट नहीं है; यह एक पवित्र दायित्त्व है, जिसे लोकतंत्र की ‘रक्तधारा’ कहा जाता है।
“जब प्रेस स्वतंत्र और निष्पक्ष होती है, तभी एक स्वस्थ समाज की कल्पना की जा सकती है।”
चौथे स्तंभ की गरिमा: मीडिया संविधान का वह स्तंभ है जो कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—तीनों पर नजर रखता है। अगर पहरेदार ही चोर से मिल जाए, तो जनता की रखवाली कौन करेगा!
जनता की आवाज बनना: असली पत्रकारिता वह है जो सत्ता के गलियारों में बैठे महलों के राजाओं को गरीब की झोपड़ी का दर्द महसूस करा सके। हाशिए पर खड़े आखिरी इंसान की आवाज बनना ही मीडिया का परम धर्म है।
सत्य के प्रति निष्ठा: एक जिम्मेदार पत्रकार का भगवान सिर्फ ‘सच’ होता है। न तो किसी का डर और न ही किसी का पक्षपात—यही पत्रकारिता का असली आभूषण है।
अब भी वक्त है, जाग जाओ!
आज गोदी मीडिया का यह षड्यंत्र सिर्फ लोकतंत्र के लिए ही नहीं, बल्कि देश के भविष्य के लिए भी एक नासूर बन चुका है। जनता अब सब समझ रही है। सोशल मीडिया और वैकल्पिक पत्रकारिता ने इस गोदी तंत्र की पोल खोलनी शुरू कर दी है।
समय आ गया है कि मुख्यधारा के ये बिके हुए चेहरे अपनी गिरेबान में झांकें। अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो टीआरपी की अंधी दौड़ छोड़कर फिर से ‘सच, साहस और सरोकार’ के रास्ते पर लौटना ही होगा। वरना इतिहास इन बिकाऊ कलमकारों को कभी माफ नहीं करेगा!










