गुण की कीमत मिलती है… गुनाह की चुकानी पड़ती है! इंद्र यादव/मुंबई

इंद्र यादव/मुंबई

समाज बड़ा अजीब है। यहां ईमानदार आदमी से पूछा जाता है—“इतने सीधे क्यों हो?” और बेईमान से पूछा जाता है—“इतना आगे कैसे बढ़ गए?”

बस, यहीं से गुण और गुनाह की असली कहानी शुरू होती है।

गुण की कीमत होती है और गुनाह की भी। फर्क सिर्फ इतना है कि गुण की कीमत मिलने में वक्त लगता है, जबकि गुनाह का मजा तुरंत मिल जाता है। शायद यही वजह है कि आज धैर्य कम और बेईमानी ज्यादा दिखाई देती है।

झूठ बोलिए—काम जल्दी हो जाएगा।
किसी का हक मारिए—जेब भारी हो जाएगी।
धोखा दीजिए—आपको चालाक कहा जाएगा।
रिश्वत लीजिए—व्यवस्था का हिस्सा समझे जाएंगे।

और अगर ईमानदारी से चलिए तो लोग आपको मूर्ख घोषित करने में देर नहीं करेंगे।

वाह रे समाज!

यह कैसी तरक्की है, जहां चरित्र पुराना फैशन और चालाकी आधुनिक योग्यता बन गई है?

लेकिन जिंदगी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह किसी की चमक से प्रभावित नहीं होती। समय सबका हिसाब रखता है। गुनाह चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, उसका ब्याज जरूर बढ़ता है।

जिस हक को आपने दबाया था, वह कभी न कभी सवाल बनकर सामने आता है। जिस भरोसे को आपने तोड़ा था, उसकी किरचें कभी न कभी अपने ही पैरों में चुभती हैं। जिस झूठ को आपने अपनी सफलता की सीढ़ी बनाया था, वही झूठ एक दिन आपके चरित्र की पहचान बन जाता है।

गुनाह का सबसे बड़ा दंड अदालत नहीं देती—कई बार इंसान की अपनी अंतरात्मा देती है।

और गुण?

गुण भी सस्ता नहीं है।

सच बोलेंगे तो दुश्मन बनेंगे। ईमानदार रहेंगे तो रास्ते कठिन होंगे। गलत के सामने खड़े होंगे तो अकेले पड़ेंगे। लेकिन यह अकेलापन भी उस भीड़ से बेहतर है, जो सुविधा के लिए आपके साथ खड़ी हो और स्वार्थ खत्म होते ही आपको पहचानने से इनकार कर दे।

क्योंकि सम्मान खरीदा नहीं जाता, कमाया जाता है।

आज सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, बल्कि मूल्यों की गरीबी है। आदमी के पास मकान बड़े हो गए, लेकिन दिल छोटे। बैंक खाते बड़े हो गए, लेकिन भरोसा छोटा। संपर्कों की सूची लंबी हो गई, लेकिन अपनेपन का दायरा सिकुड़ गया।

हमने सफलता का अर्थ भी बदल दिया है।

अब पूछा जाता है—“कितना कमाया?”
बहुत कम पूछा जाता है—“कैसे कमाया?”

यही सवाल समाज के आईने पर धूल की तरह जम गया है।

कुछ लोग भाग्य को दोष देते हैं। कहते हैं—“उसकी किस्मत अच्छी थी।” लेकिन सच यह है कि किस्मत कई बार अचानक नहीं बनती। वह हमारे रोज के छोटे-छोटे फैसलों से तैयार होती है।

आज बोया गया झूठ कल अविश्वास बनकर लौटता है।
आज बोया गया छल कल अकेलापन बनकर लौटता है।
आज बोई गई ईमानदारी कल सम्मान बनकर लौटती है।

समय की अदालत में न कोई वीआईपी है, न कोई आम आदमी।

वहां पद नहीं, कर्म बोलते हैं। पैसा नहीं, चरित्र बोलता है।

इसलिए सवाल यह नहीं कि दुनिया आपको क्या समझती है। असली सवाल यह है कि जब रात को कोई देखने वाला न हो और आप खुद अपने सामने खड़े हों, तब आप अपनी आंखों में कितनी देर तक आंखें डाल सकते हैं?

यही असली परीक्षा है।

गुण की राह कठिन हो सकती है, लेकिन अंततः वह आपको खुद से मिलाती है।

गुनाह की राह आसान लग सकती है, लेकिन अंततः वह आपको खुद से दूर कर देती है।

तो फैसला आज भी आपके हाथ में है।

गुण की कीमत चुकाइए—सम्मान मिलेगा।
गुनाह की कीमत मत समझिए—तो जिंदगी ब्याज समेत वसूल करेगी।

क्योंकि समय न रिश्वत लेता है, न सिफारिश मानता है।

और जिंदगी का सबसे कठोर सच यही है—

**गुण की कीमत मिलती है…

गुनाह की कीमत चुकानी पड़ती है।**

हिसाब देर से हो सकता है, लेकिन अधूरा नहीं।

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