नवीन यादव की कलम से : एक रात झांसी स्टेशन पर मिली सीख, जो आज आईजी रमेश चंद्र जी की विदाई पर फिर याद आ गई घायल युवक का वीडियो बनाने से शुरू हुई बात, लेकिन पूर्व में झांसी में तैनात रहे वरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्त रमेश चंद्र की एक सीख ने पत्रकारिता की जिम्मेदारी का नया अर्थ समझाया

 

रिपोर्ट: नवीन यादव

झांसी कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो वक्त गुजरने के साथ धुंधली नहीं होतीं, बल्कि समय के साथ और गहरी होती चली जाती हैं। कुछ मुलाकातें भले ही छोटी हों, लेकिन उनका असर जिंदगी भर रहता है। कुछ शब्द उस समय सामान्य लगते हैं, मगर वर्षों बाद वही शब्द जीवन की सबसे बड़ी सीख बन जाते हैं। मेरे लिए पूर्व में झांसी में वरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्त के पद पर तैनात रहे रमेश चंद्र जी से जुड़ी एक ऐसी ही याद आज भी दिल में बसी हुई है।

बात उन दिनों की है, जब रमेश चंद्र जी झांसी में वरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्त के पद पर तैनात थे और वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी रेलवे स्टेशन आरपीएफ पोस्ट की जिम्मेदारी प्रभारी निरीक्षक अशोक कुमार यादव संभाल रहे थे।

रात करीब 11 बजे का समय था। मैं अपने एक रिश्तेदार को छोड़ने वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी रेलवे स्टेशन पहुंचा था। रिश्तेदार को ट्रेन में बैठाने के बाद मैं प्लेटफार्म से फुट ओवर ब्रिज के रास्ते नीचे उतरकर आ रहा था। तभी मेरी नजर एक घायल युवक पर पड़ी। उसके सिर से खून निकल रहा था। वह दृश्य देखकर मैं वहीं रुक गया। एक पत्रकार होने के नाते मेरे मन में उस घटना को कैमरे में दर्ज करने का विचार आया और मैंने अपने मोबाइल फोन से वीडियो बनाना शुरू कर दिया।

इसी दौरान आरपीएफ पोस्ट प्रभारी निरीक्षक अशोक कुमार यादव वहां पहुंचे और उन्होंने मेरा मोबाइल फोन मेरे हाथ से लेकर अपने पास रख लिया। इसके बाद उन्होंने मुझसे कई सवाल किए—वीडियो क्यों बना रहे हैं? आप कौन हैं? क्या आप मीडिया से हैं? क्या आपने वीडियो बनाने के लिए अनुमति ली है? क्या आपके पास प्लेटफार्म टिकट है?

उस समय मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे। मैंने तत्कालीन वरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्त रमेश चंद्र जी को फोन किया और उन्हें पूरी घटना बताई। मैंने बताया कि स्टेशन पर एक घायल युवक था, जिसका मैं वीडियो बना रहा था और इसी दौरान आरपीएफ प्रभारी निरीक्षक ने मेरा मोबाइल अपने पास रख लिया।

रमेश चंद्र जी ने मेरी पूरी बात बड़े ध्यान से सुनी। उनकी आवाज में हमेशा की तरह गंभीरता थी। उन्होंने मुझसे भी एक सवाल किया—”क्या आपके पास वीडियो बनाने की अनुमति है? क्या आपके पास प्लेटफार्म टिकट है?”

मैंने सहज भाव से जवाब दिया—”नहीं सर।”

इसके बाद उन्होंने जो बात कही, वह मेरे लिए केवल उस रात की बातचीत नहीं थी, बल्कि पत्रकारिता के सफर में मिली एक ऐसी सीख थी, जिसे मैं आज भी अपने साथ लेकर चल रहा हूं। उन्होंने मुझे समझाया कि पत्रकारिता समाज का चौथा स्तंभ जरूर है, लेकिन इस जिम्मेदारी के साथ नियमों और कानूनों का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। किसी घटना को सामने लाने की जल्दबाजी में हमें अपनी जिम्मेदारियों और मर्यादाओं को कभी नहीं भूलना चाहिए।

उस रात शायद मुझे लगा हो कि एक अधिकारी मुझे रोक रहा है, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस होता है कि वह मुझे रोक नहीं रहे थे, बल्कि एक पत्रकार को उसकी जिम्मेदारी का आईना दिखा रहे थे।

यही तो एक अच्छे अधिकारी की पहचान होती है—वह केवल अपने अधीनस्थों को नियम नहीं सिखाता, बल्कि समाज के हर व्यक्ति को उसकी जिम्मेदारी का एहसास भी कराता है।

आज जब भारतीय रेलवे सुरक्षा बल सेवा के वर्ष 1996 बैच के प्रतिष्ठित अधिकारी रमेश चंद्र अपनी लंबी, समर्पित और सराहनीय शासकीय सेवा पूरी कर सेवानिवृत्त हो रहे हैं, तब झांसी की वह रात अनायास ही मेरी आंखों के सामने आ खड़ी हुई है।

वक्त बदल गया। झांसी की वह रात भी पीछे छूट गई। स्टेशन पर हुए उस घटनाक्रम को भी वर्षों बीत गए, लेकिन रमेश चंद्र जी की वह सीख आज भी मेरे मन में जीवित है।

एक पत्रकार के रूप में मैंने अनेक अधिकारियों को देखा, अनेक लोगों से मुलाकात हुई और न जाने कितनी घटनाओं को खबरों का रूप दिया। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके पद से कहीं बड़ी होती है। रमेश चंद्र जी भी मेरे लिए ऐसे ही अधिकारी रहे हैं।

आज उनकी सेवानिवृत्ति के अवसर पर मन में एक अजीब-सी आत्मीयता है। एक ओर उनकी लंबी सेवा पूरी होने की खुशी है, तो दूसरी ओर झांसी में उनके साथ जुड़ी यादों से विदाई का भाव भी मन को भावुक कर रहा है।

रमेश चंद्र जी, आपकी सरकारी सेवा समाप्त हुई है, लेकिन आपकी दी हुई सीख और आपकी यादें कभी सेवानिवृत्त नहीं होंगी।

झांसी की धरती और यहां से जुड़ी आपकी स्मृतियां हमेशा उन लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी, जिन्होंने आपको करीब से देखा और आपकी कार्यशैली को महसूस किया।

आपको सेवानिवृत्ति की हार्दिक शुभकामनाएं। ईश्वर आपको स्वस्थ, प्रसन्न और दीर्घायु जीवन प्रदान करें। आने वाला हर दिन आपके जीवन में नई खुशियां लेकर आए।

आपने वर्दी में वर्षों तक कर्तव्य निभाया, अब जीवन का यह नया अध्याय सुकून, सम्मान और अपनों के साथ खुशियों से भरा हो—यही दिल से कामना है।

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