🔴 EXCLUSIVE | VERDICT NEWS सुविधाएं मिलीं, लेकिन रोजगार छिना तो परिवार कैसे चलेगा? झांसी स्टेशन के 163 सहायकों की रोजी-रोटी पर चार पहिया वाहनों की दस्तक का असर रेलवे देता है इलाज, यात्रा पास, बच्चों की मुफ्त पढ़ाई और वर्दी—पर घटते काम ने बढ़ाई चिंता यात्रियों का बोझ उठाकर परिवार पालने वालों के सामने अब अपने ही रोजगार को बचाने की चुनौती

झांसी। वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का सामान उठाकर उनकी यात्रा आसान बनाने वाले 163 लाइसेंसधारी कुली, जिन्हें रेलवे की ओर से ‘सहायक’ कहा जाता है, आज सुविधाओं और रोजगार के दोहरे सवाल के बीच खड़े हैं। रेलवे बोर्ड की ओर से सहायकों और उनके परिवारों के लिए चिकित्सा, यात्रा पास, बच्चों की शिक्षा, वर्दी और विश्राम गृह जैसी कई सुविधाओं का प्रावधान है। लेकिन दूसरी ओर स्टेशन पर यात्रियों और उनके सामान को चार पहिया वाहनों से लाने-ले जाने की व्यवस्था बढ़ने से सहायकों के पारंपरिक काम पर असर पड़ने की चिंता सामने आई है।

रेलवे की सुविधाओं का सहारा

सहायकों और उनके परिवार को रेलवे अस्पताल एवं स्वास्थ्य इकाइयों में चिकित्सा सुविधा, यात्रा के लिए पास और पीटीओ जैसी सुविधाएं मिलती हैं। उनके बच्चों के लिए रेलवे अथवा संबंधित संस्थाओं द्वारा संचालित विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान है।

50 या उससे अधिक सहायकों वाले स्टेशनों पर विश्राम गृह की व्यवस्था की जाती है। वहीं सहायकों को प्रतिवर्ष तीन लाल शर्ट और एक ऊनी शर्ट वर्दी के रूप में दिए जाने का प्रावधान है। भारी सामान ले जाने के लिए रेलवे की लाइट ट्रॉली अथवा हाथ ठेला के इस्तेमाल की सुविधा भी उपलब्ध है।

लेकिन चार पहिया वाहन बन रहे चुनौती

सहायकों के सामने सबसे बड़ा सवाल अब उनकी दैनिक कमाई का है। यात्रियों और सामान को चार पहिया वाहनों से स्टेशन तक लाने-ले जाने की व्यवस्था शुरू होने से सहायकों को मिलने वाला काम कम होने की बात सामने आ रही है।

सहायकों का कहना है कि यात्रियों का सामान उठाना उनका वर्षों पुराना रोजगार है। इसी आमदनी से उनके परिवार का भरण-पोषण होता है। यदि सामान की ढुलाई का बड़ा हिस्सा चार पहिया वाहनों के जरिए होने लगा तो उनके हिस्से में काम और आय दोनों कम हो सकते हैं।

सवाल सुविधा का नहीं, रोजगार बचाने का

सहायक आधुनिक सुविधा के विरोध में नहीं हैं। उनका कहना है कि यात्रियों को सुविधा मिलनी चाहिए, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है जिसमें यात्रियों को सुविधा देने के साथ उन लोगों की रोजी-रोटी भी सुरक्षित रहे, जो वर्षों से स्टेशन पर सेवा देकर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं।

रेलवे की कल्याणकारी सुविधाएं निश्चित रूप से सहायकों के लिए राहत हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर काम ही कम होता गया तो इन सुविधाओं के साथ परिवार की रोजी-रोटी कैसे चलेगी?

यही वह सवाल है, जिस पर रेलवे प्रशासन और संबंधित व्यवस्था को गंभीरता से विचार करना होगा।

रिपोर्ट: नवीन यादव
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