महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को ज्यादा है पार्किंसंस का रिस्क, दोनों में लक्षण भी दिखते हैं बिल्कुल अलग

एक नए अध्ययन के अनुसार, पार्किंसंस डिजीज पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है।

 हाल ही में पार्किंसंस रोग को लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण अध्ययन किया गया है। इस शोध में लगभग 11,000 मरीजों को शामिल किया गया। इस विशाल अध्ययन से एक बेहद अहम जानकारी सामने आई है कि पार्किंसंस की बीमारी पुरुषों और महिलाओं को एक समान नहीं, बल्कि बिल्कुल अलग-अलग तरीके से प्रभावित करती है।

आइए जानते हैं कि इस शोध में पार्किंसंस के लक्षणों और जोखिम कारकों को लेकर क्या-क्या खुलासे हुए हैं।

बीमारी का खतरा किसे ज्यादा है?

अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि पार्किंसंस रोग महिलाओं की तुलना में पुरुषों में डेढ़ गुना अधिक पाया जाता है। यही कारण है कि इस सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले कुल लोगों में से 63 प्रतिशत पुरुष थे। हालांकि, बीमारी का खतरा भले ही पुरुषों को ज्यादा हो, लेकिन यह दोनों वर्गों में अलग-अलग तरह से सामने आती है।

महिलाओं में जल्दी दिखते हैं लक्षण

शोध में उम्र को लेकर एक दिलचस्प अंतर देखने को मिला। भले ही पुरुष इस बीमारी का ज्यादा शिकार होते हैं, लेकिन महिलाओं में इसके लक्षण पुरुषों के मुकाबले थोड़ी कम उम्र में ही नजर आने लगते हैं:

लक्षण शुरू होने की औसत उम्र: महिलाओं में 63.7 वर्ष बनाम पुरुषों में 64.4 वर्ष।

बीमारी की पहचान की औसत उम्र: महिलाओं में 67.6 वर्ष बनाम पुरुषों में 68.1 वर्ष।

किसे होती है क्या परेशानी?

इस बीमारी के लक्षण और उनके बढ़ने का तरीका पुरुषों और महिलाओं में काफी अलग पाया गया है। अध्ययन के दौरान मरीजों के अनुभवों के आधार पर निम्नलिखित अंतर स्पष्ट हुए हैं:

महिलाओं में अधिक पाए जाने वाले लक्षण:

दर्द की समस्या: 70 प्रतिशत महिलाओं को बीमारी के दौरान दर्द की शिकायत रही, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 63 प्रतिशत था।

गिरने की आशंका: 45 प्रतिशत महिलाओं में शारीरिक संतुलन बिगड़ने या गिरने की समस्या देखी गई, जबकि 41 प्रतिशत पुरुषों ने इसका अनुभव किया।

पुरुषों में अधिक पाए जाने वाले लक्षण:

याददाश्त में बदलाव: 67 प्रतिशत पुरुषों को स्मृति से जुड़ी परेशानियां अधिक हुईं, जबकि महिलाओं में यह 61 प्रतिशत पाया गया।

आवेगपूर्ण व्यवहार: यह सबसे बड़ा अंतर था। 56 प्रतिशत पुरुषों में बिना सोचे-समझे अचानक प्रतिक्रिया देने के लक्षण देखे गए, जबकि केवल 19 प्रतिशत महिलाओं में ऐसा पाया गया।

यह अध्ययन हमारे लिए क्यों जरूरी है?

यह अध्ययन हमारे लिए क्यों जरूरी है?

इस तरह के विस्तृत अध्ययन पार्किंसंस रोग से जुड़े जोखिम कारकों को गहराई से समझने में हमारी बहुत मदद करते हैं। इनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि:

पार्किंसंस की बीमारी हर मरीज के लिए एक अलग अनुभव है।

हर व्यक्ति को एक ही जैसे लक्षण महसूस नहीं होते हैं और न ही उनकी गंभीरता एक समान होती है।

समय के साथ-साथ इस बीमारी के बढ़ने की गति भी हर व्यक्ति में अलग पाई जाती है।

चूंकि हर मरीज की स्थिति और लक्षण अलग होते हैं, इसलिए इस बीमारी का इलाज भी व्यक्ति की स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न तरीके से किया जाता है।

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