उत्तराखंड के इस जिले से भगवान परशुराम का नाता, शांत हुआ था क्रोध; जानें सौम्यकाशी का रहस्य
इस जिले को भगवान परशुराम की तपस्थली माना जाता है। माता-पिता के अपमान पर क्षत्रियों का 21 बार संहार करने के बाद भी जब उनका क्रोध शांत नहीं हुआ, तो उन्होंने वरुणावत पर्वत पर तपस्या की।
उत्तरकाशी। उत्तरकाशी जनपद को भगवान परशुराम की तपस्थली कहा जाता है। मान्यता है कि अपने माता-पिता के अपमान से क्रोधित परशुराम ने संपूर्ण भूमि को 21 बार क्षत्रियों का संहार कर क्षत्रिय विहीन किया था। लेकिन जब इसके बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तो भगवान शिव की सलाह पर उत्तरकाशी के वरुणावत पर्वत पर तपस्या की थी, जिसके बाद उनका क्रोध शांत हुआ। यहां भगवान परशुराम का क्रोध शांत होने के चलते ही उत्तरकाशी को सौम्यकाशी नाम से भी जाना जाता है
सात चिरंजीवियों में से एक भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। अपने तप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसंन्न कर उनसे परशु प्राप्त करने के चलते ही उनका नाम परशुराम पड़ा था। ऋषि जमदग्नि व माता रेणुका के पुत्र परशुराम के क्षत्रियों का संहार करने के पीछे भी एक कहानी है,
कहा जाता है कि एक बार क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जंगलों से होता हुआ जमदग्नि ऋषि के आश्रम में विश्राम करने पहुंचा। महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को अपने आश्रम का मेहमान समझकर खूब स्वागत सत्कार किया। ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इंद्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक चमत्कारी गाय थी। उसी गाय की मदद से जमदग्नि ऋषि ने कुछ ही पलों में सहस्त्रार्जुन की पूरी सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया।










