जालौन में प्रशासनिक ‘इंटेलिजेंस’ फेल या आस्था की आड़ में कानून को चुनौती? तय मानक से ऊंचे 5 ताजिए थमे, ‘हाई-टेंशन’ पर हाई-वोल्टेज ड्रामा!
जालौन( उरई) उत्तर प्रदेश के जालौन नगर में मोहर्रम के मौके पर कानून व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा को ताक पर रखने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। पीस कमेटी (शांति समिति) की बैठक और माणनीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तय विधिक दिशा-निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए नगर में निर्धारित 12 फीट की सीमा से दोगुने ऊंचे लगभग पांच विशालकाय ताजिए बनाकर खड़े कर दिए गए। अब आलम यह है कि हाई-टेंशन बिजली की लाइनों के नीचे मौत का खतरा मंडरा रहा है, जिसके चलते प्रशासन ने इन ताज़ियों को आगे बढ़ाने पर विधिक रोक लगा दी है।
इन कानूनी धाराओं के तहत फंस सकता है पेंच
तकिया मैदान में रखे रमजानी कबाड़ी, भाड़ के ताजिए सहित अन्य तीन ताज़ियों की ऊंचाई को लेकर कानून के जानकारों का कहना है कि यह मामला सीधे तौर पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 285 (सार्वजनिक मार्ग में बाधा), धारा 287 (दूसरों के जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना) और विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 138-140 के तहत दंडनीय कृत्य की श्रेणी में आ सकता है। बिजली के तारों को ऊंचा करने या सड़क खोदने की अव्यावहारिक मांग विधिक रूप से “सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने” की श्रेणी में आती है।
सबसे बड़ा खोजी सवाल: 6 महीने से सो रहा था खुफिया तंत्र (LIU)?
ताजियादारों का यह तर्क प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलता है कि “ताजिया पिछले 6 महीने से बन रहा था, इसलिए ऊंचाई कम करना संभव नहीं है।” विधिक सवाल यह उठता है कि यदि निर्माण 6 महीने से चल रहा था, तो स्थानीय पुलिस, बीट अधिकारी और स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) क्या सो रही थी? कानूनन, त्योहारों से पहले प्रिवेंटिव पुलिसिंग (Preventive Policing) का नियम है। जब ढांचा बड़ा हो रहा था, तब प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत नोटिस जारी क्यों नहीं किया?
मौके पर पहुंचे एसडीएम: ‘नो कॉम्प्रोमाइज ऑन लॉ’
गतिरोध को बढ़ता देख एसडीएम रिंकू सिंह राही भारी पुलिस बल के साथ मौके पर डटे हुए हैं। उन्होंने भावुकता के बजाय पूरी तरह से विधिक और व्यावहारिक रुख अपनाते हुए ताजियादारों को दो टूक चेतावनी दी। एसडीएम ने कानूनी दायरे में रहकर बीच का हिस्सा (गुम्बद/ढांचा) हटाकर ऊंचाई कम करने का विधिक विकल्प दिया है।
एसडीएम रिंकू सिंह राही का कड़ा रुख:-
“आस्था का पूरा सम्मान है, लेकिन किसी भी नागरिक की जान को खतरे में डालकर विधिक मानकों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं होगा। यदि नियमों की अनदेखी कर जुलूस जबरन आगे बढ़ाया गया, तो कानून अपनी पूरी सख्ती से काम करेगा।”
निष्कर्ष: कानून जीतेगा या हठधर्मिता?
इस पूरे मामले ने अब एक गंभीर विधिक मोड़ ले लिया है। प्रशासन किसी भी दबाव में झुकने को तैयार नहीं है और उसने साफ कर दिया है कि कानून सबके लिए बराबर है। अब गेंद पूरी तरह से ताजियादारों के पाले में है—या तो वे अपनी गलती स्वीकार कर ताज़ियों की ऊंचाई को कानूनी दायरे (12 फीट) में लाएं, या फिर सुरक्षा कारणों से ये ताज़िए वहीं थमे रहेंगे। पूरे नगर में भारी पुलिस बल और खुफिया एजेंसियां मुस्तैद हैं ताकि कोई भी उपद्रवी तत्व इस प्रशासनिक गतिरोध का गलत फायदा न उठा सके।










