जब जनता जागती है, तो सिंहासन कांप उठते हैं!

 

/मुंबई/आज देश के हालात देखकर ऐसा लगता है कि लोकतंत्र की परिभाषा बदलकर ‘जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शोषण’ कर दी गई है। महलों में बैठे हुक्मरानों को शायद यह गलतफहमी हो गई है कि चमकती हुई गाड़ियां, लाल बत्तियां और सरकारी मशीनरी हमेशा के लिए उनकी बपौती बन चुकी है। लेकिन जब-जब सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है, तब-तब सड़कों पर जनता का गुस्सा लावा बनकर फूट पड़ता है। आज का यह आंदोलन महज कुछ लोगों की भीड़ नहीं है, बल्कि यह उस सड़े-गले सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो खुद को भगवान और आम आदमी को कीड़ा समझता है।

आंदोलन का असल मकसद: कुर्सी नहीं, अधिकारों की लड़ाई

जब आम इंसान अपनी रोजमर्रा की रोटी, हक और इंसाफ के लिए सड़क पर उतरता है, तो सत्ता के पाले में बैठे लोग सबसे पहले यही भौंकना शुरू करते हैं कि “इनका मकसद सिर्फ राजनीति है।” अरे साहब, आम जनता को राजनीति की कौन सी मलाई खानी है? इस आंदोलन का मकसद न तो किसी नेता को गद्दी से उतारना है और न ही किसी को बिठाना है।
इस बगावत की असली वजहें साफ़ हैं.
सुनवाई का अभाव: हुक्मरानों के बहरे कानों तक अपनी बात पहुंचाने का अब इसके अलावा कोई जरिया नहीं बचा है।
बराबरी का हक: जहां एक तरफ चंदे और पूंजीपतियों के कर्ज माफ हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मेहनतकश इंसान पाई-पाई को मोहताज है।
संविधान की धज्जियां: जो कानून गरीबों की ढाल बनने चाहिए थे, वे आज सत्तापतियों की लाठी बन चुके हैं।

सत्ता का घटिया षड्यंत्र: हर हथकंडा फेल

जब-जब जनता ने अपने हक की मांग की, तब-तब इन चालाक सियासतदानों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए ऐसे-ऐसे घटिया पैंतरे चले हैं कि अच्छे-अच्छे चाणक्य भी शरमा जाएं। आइए जरा इन नकाबपोश चेहरों के षड्यंत्रों को बेनकाब करते हैं.
देशद्रोह का तमगा फ्री में बांटना: जैसे ही कोई आम आदमी अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछता है, सरकार के दरबारी मीडिया और आईटी सेल उसे तुरंत ‘देशद्रोही’, ‘अराजक’ या ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का सर्टिफिकेट थमा देते हैं। क्या सरकार से सवाल पूछना देशद्रोह हो गया है!
फूट डालो और चैन की बंसी बजाओ: जाति, धर्म और भाषा के नाम पर जहर घोलना इनका पुराना नुस्खा है। एकता की ताकत से डरने वाले ये लोग सोचते हैं कि अगर जनता आपस में लड़ती रहेगी, तो उनका सिंहासन सुरक्षित रहेगा।
थकाओ और भटकाओ पॉलिसी: बातचीत का ढोंग रचना, लंबी तारीखें देना और मीडिया के जरिए दुष्प्रचार करना ताकि आंदोलनकारी खुद-ब-खुद थककर घर बैठ जाएं।

खुली चेतावनी: सिंहासन की चूलें हिलना तय है

हुक्मरानों को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि यह देश किसी की जागीर नहीं है। लाठियों के जोर पर, जेलों के डर से और प्रोपोगंडा के दम पर आप आवाज़ों को कुछ वक्त के लिए दबा तो सकते हैं, लेकिन मिटा नहीं सकते।
आज का पढ़ा-लिखा और जागरूक युवा सब समझ रहा है कि कौन उसका हमदर्द है और कौन सिर्फ वोटों की फसल काटने वाला बहरूपिया। वक्त रहते अपनी अकड़ छोड़िए और जनता की सुनिए, वरना यह जनसैलाब जब हिलोरे लेगा, तो सिंहासन के पाए किस कोने में जाकर गिरेंगे, इसका अंदाजा भी आपको नहीं होगा।
अब जनता जागेगी भी, सवाल भी पूछेगी और जवाब भी लेगी—क्योंकि लोकतंत्र में मालिक जनता है, कुर्सी पर बैठने वाले किराएदार!

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