महंगाई का दौर: तब मुट्ठी में पैसे थे, आज मुट्ठी में शंकर है कभी ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ फिल्म का गीत—“हाय महंगाई, महंगाई…”—सिर्फ फिल्मी गीत नहीं लगता था, बल्कि आम आदमी की परेशानी की आवाज नजर आता
नवीन यादव की कलम से
कभी ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ फिल्म का गीत—“हाय महंगाई, महंगाई…”—सिर्फ फिल्मी गीत नहीं लगता था, बल्कि आम आदमी की परेशानी की आवाज नजर आता था। उस दौर में भी महंगाई को लेकर चिंता थी, लेकिन आज की तस्वीर देखिए तो वही गीत जैसे नए अर्थ के साथ सामने खड़ा दिखाई देता है।
तब शंकर खरीदने निकलते थे तो मुट्ठी में पैसे होते थे और थैले में सामान आ जाता था। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि थैले में पैसे लेकर बाजार जाइए, लेकिन लौटते समय थैला हल्का और जेब खाली नजर आती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आम आदमी की आमदनी और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच बढ़ती दूरी आखिर कैसे कम होगी? रसोई का बजट हो, बच्चों की पढ़ाई, इलाज का खर्च, घर का किराया या रोजमर्रा का राशन—हर तरफ बढ़ती कीमतें परिवार के बजट को प्रभावित कर रही हैं।
महंगाई का असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहता। जब सब्जी, दाल, तेल, दूध और अन्य जरूरी सामान महंगे होते हैं तो इसका सीधा असर पूरे परिवार की जीवनशैली पर पड़ता है। आम आदमी अपनी जरूरतों में कटौती करता है, इच्छाएं टालता है और महीने के अंत तक हिसाब-किताब जोड़ता रहता है।
विडंबना देखिए—पहले मुट्ठी में पैसे लेकर बाजार जाते थे और सामान थैले में भरकर लौटते थे। आज थैले में पैसे लेकर बाजार जाते हैं और मुट्ठी में सामान लेकर लौटने की नौबत आ जाती है।
यही वजह है कि दशकों पहले गाया गया महंगाई का वह गीत आज भी लोगों को अपनी कहानी सुनाता हुआ महसूस होता है। समय बदला, बाजार बदला, आमदनी बढ़ी, सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन आम आदमी की एक चिंता आज भी वही है—रोटी का खर्च कैसे चले, घर का बजट कैसे संभले और महीने की कमाई महीने के आखिर तक कैसे टिके?
सच तो यही है कि महंगाई के आंकड़े चाहे जितने भी हों, उसकी असली तस्वीर उस व्यक्ति के चेहरे पर दिखाई देती है जो बाजार में सामान की कीमत पूछकर धीरे से कहता है—“इतने में तो पहले पूरा थैला आ जाता था।”
कभी मुट्ठी में पैसे और थैले में सामान हुआ करता था, आज थैले में पैसे हैं और मुट्ठी में सामान—यही बदलते वक्त और बढ़ती महंगाई की सबसे सरल तस्वीर है।










