सीबीआई के 21 साल पुराने भ्रष्टाचार मामले में पूर्व आरपीएफ अधिकारी बरी सुप्रीम कोर्ट ने पलटा केरल हाईकोर्ट का फैसला, भारत राज मीणा को सभी आरोपों से किया बरी रिश्वत की रकम बिचौलिये से मिली, अधिकारी तक पहुंचने की कड़ी साबित नहीं कर सकी सीबीआई स्थानांतरण-पदस्थापना के नाम पर रिश्वत के आरोप, 2005 से चल रही कानूनी लड़ाई का सुप्रीम कोर्ट में अंत
नई दिल्ली। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के वर्ष 2005 में दर्ज भ्रष्टाचार के दो मामलों में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के पूर्व मंडल सुरक्षा आयुक्त भारत राज मीणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने 16 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए उनकी दोनों अपीलें स्वीकार कर लीं और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
मामला उस समय का है, जब भारत राज मीणा आरपीएफ के मंडल सुरक्षा आयुक्त, पालक्काड के पद पर तैनात थे। सीबीआई ने 4 अगस्त 2005 को प्राथमिकी दर्ज की थी। अभियोजन का आरोप था कि आरपीएफ कर्मियों के स्थानांतरण, पदस्थापना और अन्य सेवा संबंधी लाभ दिलाने के लिए कथित तौर पर रिश्वत ली जाती थी और इसके लिए अधीनस्थ कर्मचारियों को माध्यम बनाया गया। जांच में 12 कथित लेन-देन का उल्लेख किया गया था।
निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
सीबीआई की जांच के बाद मामला विशेष न्यायालय, सीबीआई, एर्नाकुलम पहुंचा। निचली अदालत ने 31 मई 2016 को भारत राज मीणा को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके बाद मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा।
केरल हाईकोर्ट ने 24 मई 2024 को निचली अदालत के फैसले की समीक्षा करते हुए दोषसिद्धि के कुछ हिस्सों को बरकरार रखा। इसके बाद मीणा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
बिचौलिये से मिली रकम पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के साक्ष्यों की विस्तार से समीक्षा की। अदालत ने पाया कि कथित रिश्वत की रकम अधिकारी से बरामद नहीं हुई थी, बल्कि एक बिचौलिये से मिली थी। अदालत के अनुसार केवल तीसरे व्यक्ति के पास से रकम की बरामदगी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि रकम आरोपी अधिकारी ने मांगी या स्वीकार की थी।
पीठ ने यह भी कहा कि रिश्वत किसी बिचौलिये के माध्यम से ली जा सकती है, लेकिन अभियोजन को यह विश्वसनीय रूप से साबित करना होगा कि बिचौलिया आरोपी अधिकारी की ओर से या उसके निर्देश पर रकम ले रहा था और रकम का संबंध आरोपी से स्थापित होता है।
जांच की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने एक कथित रिश्वत लेन-देन में जांच की प्रक्रिया पर भी गौर किया। अदालत के अनुसार यदि बिचौलिये के माध्यम से रकम अधिकारी तक पहुंचने का आरोप था तो जांच एजेंसी बिचौलिये पर निगरानी रखकर कथित लेन-देन की आगे की कड़ी को स्थापित कर सकती थी।
इसके बजाय बिचौलिये से रकम बरामद होते ही कार्रवाई कर दी गई। अदालत ने माना कि इससे यह निर्णायक रूप से स्थापित नहीं हो सका कि रकम वास्तव में भारत राज मीणा तक पहुंची या उनके लिए स्वीकार की गई थी।
सरकारी गवाहों की गवाही भी जांची
मामले में कथित बिचौलियों को बाद में सरकारी गवाह बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गवाही को सावधानी से परखा और कहा कि ऐसे साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि के लिए महत्वपूर्ण परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
अदालत ने पाया कि अभियोजन की कहानी की महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने वाला पर्याप्त स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं था।
दूसरे मामले में भी साक्ष्यों पर संदेह
एक अन्य कथित लेन-देन में एन.पी. गोपी कुमार से जुड़ा आरोप था। अभियोजन के अनुसार रकम बिचौलिये के माध्यम से मीणा तक पहुंची थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित समय और स्थान से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्यों को भी देखा।
अदालत के सामने मीणा की समकालीन डायरी का उल्लेख आया, जिसमें संबंधित अवधि में उनके पालक्काड से बाहर होने की बात दर्ज थी। अभियोजन इस दस्तावेज और कथित मुलाकात के बीच उत्पन्न विरोधाभास को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं कर सका। कथित तीन हजार रुपये की रकम भी मीणा से बरामद नहीं हुई थी।
रिश्वत की मांग और स्वीकार करना साबित होना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में स्थापित कानूनी सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने से जुड़े मूलभूत तथ्य अभियोजन को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करने होते हैं। केवल रकम की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 20 के तहत कानूनी अनुमान तभी लागू हो सकता है, जब अभियोजन पहले आवश्यक आधारभूत तथ्य स्थापित कर दे।
दोनों अपीलें मंजूर, दोषसिद्धि खत्म
सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित न किए जाने के आधार पर दोनों अपीलें स्वीकार कर लीं। भारत राज मीणा को दोनों मामलों में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
अदालत ने उनके जमानत बांड समाप्त करने और जमा की गई जुर्माने की राशि वापस करने का भी आदेश दिया। इस फैसले के साथ वर्ष 2005 में शुरू हुई करीब 21 साल पुरानी कानूनी प्रक्रिया का सुप्रीम कोर्ट में अंत हो गया।
रिपोर्ट: नवीन यादव










