गुरु पूर्णिमा पर विशेष : माता-पिता ही जीवन के प्रथम और सबसे बड़े गुरु आज की पीढ़ी गुरु की तलाश स्कूल, कॉलेज, किताबों और धार्मिक स्थलों में करती है, लेकिन जीवन का असली विश्वविद्यालय घर की चौखट से शुरू होता है, जहां माता-पिता संस्कारों की पहली पाठशाला खोलते हैं
रिपोर्ट नवीन यादव
झांसी। आज के दौर में गुरु की तलाश अक्सर स्कूल, कॉलेज, किताबों और बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों में की जाती है, लेकिन सच यह है कि जीवन का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय घर की चौखट से शुरू होता है। जिस मां की गोद में संस्कारों की पहली पाठशाला सजती है और जिस पिता की उंगली पकड़कर बच्चा दुनिया में पहला कदम रखता है, उनसे बड़ा गुरु जीवन में शायद ही कोई हो।
भारतीय रेल में मुख्य टिकट परीक्षक (टीटीई) के पद पर अपनी सेवाएं देकर सेवानिवृत्त हुए स्वर्गीय गंगा प्रसाद यादव और उनकी धर्मपत्नी कमला देवी को अपने जीवन का प्रथम गुरु बताते हुए कहा गया कि माता-पिता केवल संतान को जन्म देने का दायित्व ही नहीं निभाते, बल्कि पूरी जिंदगी उसके भविष्य को संवारने में अपना वर्तमान तक कुर्बान कर देते हैं।
माता-पिता ही वह गुरु हैं, जो बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी फीस के जीवन का सबसे कठिन पाठ पढ़ाते हैं। वे सही और गलत का फर्क समझाते हैं, ईमानदारी, अनुशासन और परिश्रम का महत्व बताते हैं तथा गिरने के बाद फिर उठकर आगे बढ़ना सिखाते हैं। दुनिया स्वार्थ के हिसाब से रिश्ते बदल सकती है, लेकिन माता-पिता का त्याग और संतान के प्रति उनका समर्पण किसी स्वार्थ का मोहताज नहीं होता।
आज जब आधुनिकता की अंधी दौड़ में कई लोग अपने ही माता-पिता के त्याग और संघर्ष को भूलते जा रहे हैं, ऐसे समय में गुरु पूर्णिमा का पर्व यह सवाल भी खड़ा करता है कि यदि घर में बैठे माता-पिता का सम्मान नहीं किया जा रहा तो मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और अन्य धार्मिक स्थलों पर जाकर की गई पूजा-अर्चना और धार्मिक यात्राओं का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
धार्मिक स्थलों पर माथा टेकने से पहले उस मां के चरणों में झुकना जरूरी है, जिसने अपनी नींद त्यागकर संतान को सुलाया, और उस पिता के संघर्ष को याद करना जरूरी है, जिसने अपनी जरूरतों को पीछे रखकर बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए जीवन खपा दिया। ईश्वर की तलाश मंदिरों और तीर्थस्थलों में करने से पहले अपने माता-पिता में ईश्वर का अंश पहचानना ही सच्ची श्रद्धा है।
माता-पिता ही जीवन के पहले शिक्षक हैं। बोलना, चलना, व्यवहार करना, रिश्तों की कद्र करना और समाज में सम्मान के साथ जीना—इन सभी का पहला पाठ घर से ही मिलता है। उनके संस्कार ही आगे चलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व और चरित्र की पहचान बनते हैं।
स्वर्गीय गंगा प्रसाद यादव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा गया कि जीवन में मिली शिक्षा, संस्कार और उपलब्धियों के पीछे माता-पिता के त्याग, संघर्ष और आशीर्वाद की सबसे बड़ी भूमिका है। वहीं माता कमला देवी के चरणों में नमन करते हुए उनके आशीर्वाद को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बताया गया।
भारतीय संस्कृति का संदेश भी स्पष्ट है—”मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।” माता-पिता को देवतुल्य मानकर उनका सम्मान करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रत्येक संतान का नैतिक दायित्व है।
गुरु पूर्णिमा पर यही सच सबसे तीखा है—जिस घर में माता-पिता का सम्मान नहीं, वहां बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों की यात्राएं और ज्ञान की बातें भी अधूरी हैं। क्योंकि माता-पिता से बड़ा कोई गुरु नहीं और उनके आशीर्वाद से बड़ा कोई धन नहीं।










