रेल संपत्ति कबाड़ में कैसे पहुंची ? आरपीएफ की छापेमारी ने खोले कई सवाल—₹50 हजार के रेल इंजन केबल बरामद, कबाड़ कारोबारी गिरफ्तार; तीन अन्य वांछित आरपीएफ की चौकसी पर सवाल—रेल संपत्ति चोरी होकर कबाड़ तक पहुंची, सुरक्षा तंत्र को भनक तक नहीं लगी; अब जवाबदेही किसकी?

रिपोर्ट : नवीन यादव

झांसी। रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देते हुए रेल इंजन के अल्टरनेटर रूम में इस्तेमाल होने वाले केबल आखिर कबाड़ की दुकान तक कैसे पहुंच गए? क्या रेल संपत्ति चोरी कर यहां खपाने की तैयारी थी या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? रेलवे सुरक्षा बल की ताजा कार्रवाई ने इन सवालों को जन्म दे दिया है। आरपीएफ ने छापेमारी कर करीब ₹50 हजार कीमत की रेल संपत्ति बरामद करते हुए एक कबाड़ दुकान संचालक को गिरफ्तार किया है, जबकि जांच के दौरान तीन अन्य लोगों को मुकदमे में वांछित किया गया है।

कबाड़ की दुकान पर अचानक पहुंची आरपीएफ टीम

रेल संपत्ति की चोरी और अवैध कारोबार के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत 28 जुलाई 2026 को वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी आरपीएफ पोस्ट के निरीक्षक योगेश कुमार और क्राइम विंग झांसी की संयुक्त टीम ने नयागांव रोड, नहर किनारे स्थित सीतापुर वाटिका में संचालित एक कबाड़ की दुकान पर छापेमारी की।

तलाशी के दौरान दुकान से रेलवे इंजन के अल्टरनेटर रूम में प्रयुक्त होने वाले केबल बरामद हुए। बरामद सामग्री की अनुमानित कीमत करीब ₹50 हजार बताई गई है।

न दस्तावेज मिले, न स्वामित्व का प्रमाण

आरपीएफ के अनुसार, कबाड़ दुकान संचालक धीरज साहू पुत्र बलराम साहू, उम्र 23 वर्ष, निवासी नगर, थाना प्रेमनगर, जनपद झांसी बरामद रेल सामग्री के संबंध में कोई वैध दस्तावेज अथवा स्वामित्व का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर रेल संपत्ति को कब्जे में ले लिया गया और उसके खिलाफ विधिक कार्रवाई शुरू की गई।

जांच में तीन और नाम सामने आने से बढ़ा दायरा

मामले की जांच आगे बढ़ी तो तीन अन्य आरोपियों की भूमिका भी सामने आई, जिन्हें मुकदमे में वांछित किया गया है। उनकी गिरफ्तारी के लिए आरपीएफ द्वारा प्रयास किए जा रहे हैं। गिरफ्तार आरोपी के आपराधिक इतिहास की भी जानकारी जुटाई जा रही है।

जांच के सामने पांच बड़े सवाल

पहला सवाल— रेल इंजन के अल्टरनेटर रूम में इस्तेमाल होने वाले केबल कबाड़ की दुकान तक पहुंचे कैसे?

दूसरा सवाल— यदि यह रेल संपत्ति थी तो इसे कबाड़ के रूप में किसने और कहां से उपलब्ध कराया?

तीसरा सवाल— गिरफ्तार आरोपी के अलावा तीन अन्य वांछित आरोपियों की इस मामले में क्या भूमिका है?

चौथा सवाल— क्या बरामद रेल सामग्री केवल इसी मामले तक सीमित है या पहले भी ऐसी सामग्री कबाड़ के बाजार में खपाई गई?

पांचवां सवाल— क्या जांच की अगली कड़ी में रेल संपत्ति की चोरी और अवैध खरीद-फरोख्त से जुड़े किसी बड़े नेटवर्क का खुलासा होगा?

इन सवालों का जवाब अब आरपीएफ की जांच और वांछित आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद सामने आने की उम्मीद है।

आरपीएफ की निगरानी पर भी उठे सवाल

आरपीएफ की कार्रवाई के बाद अब सवाल केवल कबाड़ की दुकान तक सीमित नहीं रह गया है। रेलवे इंजन के अल्टरनेटर रूम में इस्तेमाल होने वाला सामान आखिर रेलवे की सुरक्षित व्यवस्था से निकलकर कबाड़ के ठिकाने तक कैसे पहुंचा? यदि रेल संपत्ति चोरी की थी तो उसे चोरी होने से रोकने और चोरी के बाद बरामद करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?

रेलवे की संपत्ति की सुरक्षा के लिए आरपीएफ की तैनाती के बावजूद यदि रेल सामग्री चोरी होकर कबाड़ बाजार तक पहुंच रही है, तो यह सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी पर भी सवाल खड़े करता है। क्या आरपीएफ को रेल संपत्ति के गायब होने की भनक तक नहीं लगी, या फिर चोरी की सूचना मिलने के बाद कार्रवाई हुई? इन सवालों का जवाब भी जनता और रेलवे प्रशासन के सामने आना चाहिए।

एक कबाड़ कारोबारी की दुकान से रेल संपत्ति बरामद होना निश्चित रूप से आरपीएफ की कार्रवाई की सफलता है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि रेल संपत्ति कबाड़ की दुकान तक पहुंचने से पहले सुरक्षा तंत्र की निगरानी कहां थी? आखिर वह कौन-सी कड़ी है, जो रेलवे की संपत्ति को उसके मूल स्थान से उठाकर कबाड़ के बाजार तक पहुंचाती है?

अब जरूरत केवल एक गिरफ्तारी तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि रेल संपत्ति के स्रोत से लेकर कबाड़ की दुकान तक पहुंचने वाली पूरी श्रृंखला की जांच करने की है। यदि जांच निष्पक्ष और गहराई से हुई तो यह भी स्पष्ट हो सकता है कि मामले में केवल कबाड़ कारोबारी की भूमिका है या इसके पीछे कोई और कड़ी भी जुड़ी हुई है।

एक गिरफ्तारी के बाद असली जांच अब शुरू

आरपीएफ की कार्रवाई को भले ही एक बड़ी सफलता माना जा रहा हो, लेकिन बरामद रेल संपत्ति और तीन अन्य वांछित आरोपियों के सामने आने के बाद मामले की असली तस्वीर जांच पूरी होने पर ही साफ होगी। यदि बरामद केबल चोरी की रेल संपत्ति साबित होते हैं तो यह भी जांच का विषय होगा कि रेलवे परिसर या यार्ड से इसे बाहर निकालने में किन लोगों की भूमिका रही और यह सामग्री कबाड़ कारोबारी तक किस माध्यम से पहुंची।

रेलवे सुरक्षा बल ने स्पष्ट किया है कि रेल संपत्ति की चोरी, अवैध कब्जे, खरीद-फरोख्त और तस्करी के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहेगा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आरपीएफ की जांच इस मामले को केवल एक कबाड़ दुकान तक सीमित रखती है या फिर रेल संपत्ति के कथित अवैध कारोबार की पूरी कड़ी तक पहुंचती है।

कार्रवाई हुई, आरोपी पकड़ा गया—अब सवाल यह है कि रेल संपत्ति कबाड़ तक पहुंचाने वाला पूरा रास्ता कब खुलेगा?

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