आतंकवाद सीमा पार तबाही मचाता है, अंधभक्ति देश के भीतर! जब सवाल पूछना गुनाह और हर फैसले पर तालियां बजाना देशभक्ति बना दिया जाए, तब खतरा बाहर से ज्यादा भीतर पैदा होता है अंधी नफरत हो या अंधा समर्थन—दोनों लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं।
रिपोर्ट: नवीन यादव | VERDICT NEWS
आतंकवाद की पहचान बंदूक, बारूद और हिंसा से होती है, लेकिन अंधभक्ति का सबसे बड़ा हथियार विवेक का खत्म हो जाना है। आतंकवादी हिंसा और भय के जरिए समाज और व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, जबकि अंधसमर्थन करने वाला व्यक्ति गलत को भी सही साबित करने में जुट जाता है।
एक हिंसा के जरिए तबाही फैलाता है, तो दूसरा सवाल करने की ताकत कमजोर करके व्यवस्था को भीतर से खोखला करने का रास्ता तैयार करता है। दोनों स्थितियां समाज और देश के लिए गंभीर खतरे का संकेत हैं।
देश किसी व्यक्ति, दल या सत्ता से बड़ा है। राष्ट्रहित के नाम पर हर फैसले का आंख बंद करके समर्थन करना देशभक्ति नहीं हो सकता। जहां गलती दिखे वहां सवाल उठाना, जहां अन्याय दिखे वहां आवाज उठाना और जहां देशहित प्रभावित हो वहां असहमति दर्ज करना जागरूक नागरिक की पहचान है।
अंधी नफरत हो या अंधा समर्थन—दोनों लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं। जब नागरिक सही और गलत का फैसला तथ्यों और तर्क के बजाय किसी व्यक्ति, विचार या समूह के प्रति अंधनिष्ठा से करने लगे, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत—जनता की विवेकशीलता—कमजोर पड़ने लगती है।
देशभक्ति किसी चेहरे की जय-जयकार का नाम नहीं, बल्कि देशहित में सच बोलने का साहस है। मजबूत लोकतंत्र को आंख बंद करके समर्थन करने वालों की नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले, तर्क करने वाले और गलत के खिलाफ खड़े होने वाले जागरूक नागरिकों की जरूरत होती है।










