सरकारी स्कूलों के दरवाजे पर सरकार का पहरा, सवालों से इतना डर क्यों ? बच्चों की सुरक्षा के नाम पर प्रवेश और कैमरे पर रोक—सरकार बताए, सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत जनता तक कैसे पहुंचेगी?
रिपोर्ट: नवीन यादव
उत्तर प्रदेश के कई जिलों में परिषदीय विद्यालयों में बाहरी व्यक्तियों, यूट्यूबरों और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के बिना अनुमति प्रवेश तथा फोटो-वीडियोग्राफी पर रोक लगाने के निर्देशों ने नई बहस छेड़ दी है। अयोध्या, बलिया, आजमगढ़, मऊ और बलरामपुर समेत कई जिलों में ऐसे निर्देश सामने आए हैं। विभाग का तर्क है कि अनधिकृत प्रवेश से बच्चों की सुरक्षा, पढ़ाई और विद्यालय का माहौल प्रभावित होता है।
बच्चों की निजता और सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसी बहाने सरकारी व्यवस्था को सवालों से बचाने की कोशिश क्यों? सरकार बताए कि यदि किसी विद्यालय में शिक्षक अनुपस्थित मिलते हैं, बच्चों को पढ़ाई नहीं मिलती, मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी होती है या मूलभूत सुविधाओं की कमी सामने आती है, तो उसकी जमीनी तस्वीर जनता तक कौन पहुंचाएगा? केवल विभागीय निरीक्षण को ही अंतिम सच मान लेना क्या पर्याप्त है?
हाल के दिनों में बलिया और सीतापुर के सरकारी विद्यालयों के मध्याह्न भोजन से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। बलिया में बच्चों को हाथों में रोटियां लेकर भोजन करते दिखाने वाला वीडियो सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने जांच शुरू की और कार्रवाई की। वहीं सीतापुर में जली रोटियों और पानी जैसी सब्जी से जुड़ा वीडियो वायरल होने के बाद विभाग ने कार्रवाई की। इन घटनाओं ने यह सवाल और गंभीर कर दिया है कि अगर कैमरे और सोशल मीडिया की नजर स्कूलों तक नहीं पहुंचेगी, तो ऐसी जमीनी तस्वीरें सामने कैसे आएंगी?
बलिया में जारी निर्देश को लेकर यूट्यूबरों और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की ओर से विरोध के स्वर भी सामने आए हैं। उनका तर्क है कि कैमरा केवल मनोरंजन या प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि कई बार जमीनी हकीकत सामने लाने का जरिया भी बनता है।
सरकार से सवाल—पारदर्शिता चाहिए या सिर्फ विभागीय रिपोर्ट?
यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति विद्यालय में घुसकर बच्चों के चेहरे रिकॉर्ड करता है, कक्षा में व्यवधान डालता है या शिक्षकों का वीडियो बनाकर उसे सनसनीखेज तरीके से प्रसारित करता है, तो ऐसी मनमानी पर रोक लगना उचित है। लेकिन अनधिकृत प्रवेश पर रोक और स्वतंत्र निगरानी पर रोक—दोनों को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।
सरकारी विद्यालय जनता के पैसे से चलते हैं। फिर सरकार यह कैसे तय कर सकती है कि जनता के सवाल विद्यालय की चारदीवारी के बाहर ही रुक जाएं? विभागीय निरीक्षण अपनी जगह है, लेकिन यदि शिकायतों की जांच और व्यवस्था की तस्वीर दिखाने का अधिकार भी उसी तंत्र तक सीमित कर दिया गया, जिस पर सवाल उठ रहे हों, तो निष्पक्ष निगरानी कैसे होगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अनुमति व्यवस्था इतनी पारदर्शी होगी कि वास्तविक पत्रकार, अभिभावक या सामाजिक कार्यकर्ता किसी शिकायत की पड़ताल के लिए समय पर विद्यालय पहुंच सके?
अगर अनुमति के नाम पर सवाल पूछने वालों को ही महीनों दरवाजे पर खड़ा रखा गया, तो यह व्यवस्था बच्चों की सुरक्षा से आगे बढ़कर व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों को रोकने का हथियार बन सकती है।
कैमरा बंद करने से व्यवस्था की कमियां खत्म नहीं होंगी
सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग को बच्चों की निजता और सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम बनाने चाहिए, लेकिन पत्रकारों और अधिकृत डिजिटल मीडिया प्रतिनिधियों के लिए सरल, समयबद्ध और पारदर्शी अनुमति व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी चाहिए। सरकार को यह भरोसा पैदा करना होगा कि अनुमति की व्यवस्था सवालों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदार पत्रकारिता और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए है।
क्योंकि सवाल यह नहीं कि स्कूल में कैमरा पहुंचे या नहीं। सवाल यह है कि अगर कैमरा पहुंचे तो क्या वह बच्चों की निजता बचाते हुए सरकारी स्कूल की असली तस्वीर भी दिखा सकेगा?
सरकार को याद रखना चाहिए—कैमरा बंद करने से सरकारी स्कूलों की कमियां बंद नहीं होंगी। व्यवस्था मजबूत है तो सवालों से डर कैसा? और अगर खामी है, तो सवाल पूछने वालों पर पहरा लगाने के बजाय खामी दूर करने की जरूरत है।










