महाराष्ट्र सरकार का भाषा फरमान, ऑटो-रिक्शा चालकों पर मराठी की अनिवार्यता से देश की एकता पर उठे सवाल देश के किसी भी कोने में रहकर रोजगार और आजीविका कमाना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार क्षेत्रवाद की राजनीति बढ़ी तो महाराष्ट्र के बाद दक्षिण भारत में भी उठ सकते हैं ऐसे सवाल आज उत्तर भारतीयों को भगाने की बात, कल दूसरे राज्यों के नागरिकों के खिलाफ भी खड़ी हो सकती है यही सोच फिर पंजाब-हरियाणा सहित अन्य प्रदेश भी अपनी भाषा और क्षेत्र के नाम पर ऐसे ही सवाल उठाने लगे तो देश की एकता पर पड़ेगा असर
रिपोर्ट नवीन यादव
महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुंबई समेत पूरे राज्य में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए बोलचाल योग्य मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किए जाने को लेकर बहस तेज हो गई है। परिवहन विभाग और आरटीओ की ओर से नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए जांच और कार्रवाई का अभियान शुरू किए जाने की बात सामने आई है। मराठी भाषा नहीं जानने वाले चालकों को भाषा सीखने के लिए 30 दिन का नोटिस दिए जाने का प्रावधान बताया गया है। तय अवधि में नियमों का पालन नहीं करने पर चालक का लाइसेंस तीन महीने के लिए निलंबित करने और आगे रद्द करने जैसी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
भाषा सीखना किसी राज्य की संस्कृति और स्थानीय लोगों से संवाद के लिए अच्छी बात हो सकती है, लेकिन भाषा को रोजगार और आजीविका के अधिकार से जोड़कर किसी नागरिक के सामने संकट खड़ा करना गंभीर सवाल पैदा करता है। भारत के नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में रहने, काम करने और अपनी आजीविका कमाने का अधिकार है।
यदि किसी एक राज्य में दूसरे राज्यों से आए लोगों के साथ ऐसा व्यवहार जारी रहा, तो इसका संदेश पूरे देश में जाएगा। आज महाराष्ट्र का उदाहरण सामने है, कल यही सवाल दक्षिण भारत के राज्यों में भी उठ सकता है कि क्या वहां रहने वाले उत्तर भारत के लोगों को भी इसी तरह बाहर जाने के लिए कहा जाएगा?
इतना ही नहीं, यदि भाषा और क्षेत्र के नाम पर लोगों को बांटने की यह सोच आगे बढ़ी तो पंजाब, हरियाणा सहित अन्य प्रदेश भी अपनी भाषा, संस्कृति और क्षेत्र के नाम पर इसी तरह के सवाल उठाने लग सकते हैं। फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में रोजगार करने वाले लाखों लोगों के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। ऐसी स्थिति देश के सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
सरकार की जिम्मेदारी नागरिकों में भय पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षा, सम्मान और समान अवसर देना है। स्थानीय भाषा के ज्ञान को प्रोत्साहित किया जा सकता है, लेकिन किसी नागरिक की रोजी-रोटी पर ऐसी शर्त लगाना कि भाषा न जानने पर लाइसेंस निलंबित या रद्द हो सकता है, इस पर व्यापक संवैधानिक और सामाजिक बहस जरूरी है।
तीखी प्रतिक्रिया
देश में हर नागरिक को कहीं भी रहकर मेहनत करने और अपना पेट पालने का अधिकार है। अगर आज किसी को भाषा के नाम पर रोका या भगाया जाएगा, तो कल यही सोच दूसरे राज्यों तक भी पहुंच सकती है। सरकारों को समय रहते ऐसे रवैये पर रोक लगाकर स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि भारत किसी एक भाषा, क्षेत्र या राज्य का नहीं, बल्कि हर भारतीय का देश है।










